राजगीर ग्लास ब्रिज
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राजगीर ग्लास ब्रिज

राजगीर ग्लास ब्रिज (Rajgir Glass Bridge), जिसे आधिकारिक तौर पर नेचर सफारी, राजगीर (Nature Safari Rajgir) का हिस्सा माना जाता है, भारत के बिहार राज्य के नालंदा जिले में स्थित एक बेहद रोमांचक और आधुनिक पर्यटन स्थल है। यह बिहार का पहला और देश के चुनिंदा ग्लास ब्रिजों में से एक है। ​इस कांच के पुल और पर्यटन स्थल के बारे में मुख्य और महत्वपूर्ण जानकारियां निम्नलिखित हैं: ​1. मुख्य आकर्षण और कांच का पुल (Glass Bridge) ​संरचना और बनावट: यह पुल जमीन से लगभग 250 फीट (करीब 76 मीटर) की ऊंचाई पर पहाड़ियों के बीच बनाया गया है। ​पारदर्शी कांच: इस पुल का फर्श पूरी तरह से मजबूत और पारदर्शी पारदर्शी कांच (Transparent Glass) से बना है, जिसपर चलते समय नीचे की गहरी घाटी और हरियाली साफ-साफ दिखाई देती है। यह पर्यटकों के लिए एक बेहद रोमांचकारी (Thrilling) अनुभव होता है। ​क्षमता: इस ग्लास ब्रिज पर एक बार में सीमित संख्या में ही पर्यटकों को जाने की अनुमति दी जाती है ताकि सुरक्षा पूरी तरह से सुनिश्चित की जा सके। ​2. नेचर सफारी और अन्य रोमांचक गतिविधियाँ ​राजगीर ग्लास ब्रिज केवल एक पुल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विशाल नेचर सफारी परिसर का मुख्य हिस्सा है। यहाँ पर्यटकों के लिए कई अन्य आकर्षण भी मौजूद हैं: ​सस्पेंशन ब्रिज (Suspension Bridge): काठ और रस्सियों से बना झूला पुल, जो पहाड़ों के बीच हवा में झूलता है। ​जिप लाइन (Zip Line): वैली के एक छोर से दूसरे छोर तक हवा में रस्सी के सहारे तेजी से फिसलने का रोमांचक खेल। ​साइकिलिंग ऑन रोप (Rope Cycling): हवा में बंधी रस्सी पर साइकिल चलाने का अनूठा अनुभव। ​प्रकृति दर्शन और कैफेटरिया: पहाड़ियों के बीच ट्रैकिंग ट्रेल्स, औषधीय पौधों का पार्क, तितली पार्क (Butterfly Park) और पर्यटकों के लिए आधुनिक कैफेटरिया। ​3. इतिहास और उद्घाटन ​इस पूरे नेचर सफारी और ग्लास ब्रिज प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य राजगीर में धार्मिक पर्यटन (जैसे बौद्ध और जैन तीर्थ स्थल) के साथ-साथ इको-टूरिज्म (Eco-Tourism) को बढ़ावा देना है। ​इस प्रोजेक्ट का उद्घाटन बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा किया गया था, जिसके बाद से यह देश भर के पर्यटकों के बीच आकर्षण का बड़ा केंद्र बन चुका है। ​4. घूमने का सबसे अच्छा समय और यात्रा की जानकारी ​स्थान: यह नालंदा जिले के ऐतिहासिक शहर राजगीर में स्थित 'वेणुवन' और 'शांति स्तूप' के आसपास की पहाड़ियों के बीच है। ​सबसे अच्छा समय: यहाँ घूमने के लिए अक्टूबर से मार्च (सर्दी का मौसम) का समय सबसे बेहतरीन माना जाता है, क्योंकि इस दौरान यहाँ का मौसम बेहद सुहाना होता है। ​टिकट और बुकिंग: यहाँ घूमने के लिए पर्यटकों को ऑनलाइन या काउंटर से नेचर सफारी और ग्लास ब्रिज का कंबाइंड टिकट लेना होता है। सुरक्षा कारणों से यहाँ नियमों का सख्ती से पालन किया जाता है।

श्री राम मंदिर,अयोध्या
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श्री राम मंदिर,अयोध्या

श्री राम जन्मभूमि मंदिर (अयोध्या राम मंदिर) भारत के उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर अयोध्या में स्थित, भगवान श्री राम के बाल रूप (रामलला) को समर्पित एक भव्य और ऐतिहासिक हिंदू मंदिर है। यह स्थान सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए दुनिया के सबसे पवित्र और प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। इस मंदिर के बारे में मुख्य और महत्वपूर्ण जानकारियां निम्नलिखित हैं: 1. इतिहास और कानूनी संघर्ष ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: अयोध्या को भगवान श्रीराम की जन्मभूमि माना जाता है। सदियों पुराने इस विवादित स्थल पर कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक चली। सुप्रीम कोर्ट का फैसला: 9 नवंबर 2019 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पूरी जमीन राम मंदिर के निर्माण के लिए ट्रस्ट को सौंप दी और मुस्लिमों को मस्जिद के लिए अलग जमीन देने का आदेश दिया। शिलान्यास और प्राण प्रतिष्ठा: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 5 अगस्त 2020 को इस मंदिर की आधारशिला (भूमि पूजन) रखी गई थी। इसके बाद, 22 जनवरी 2024 को एक भव्य प्राण प्रतिष्ठा समारोह के तहत 'रामलला' की नई मूर्ति को गर्भगृह में स्थापित किया गया। 2. वास्तुकला और बनावट (Architecture) अयोध्या का राम मंदिर प्राचीन और आधुनिक भारतीय वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है, जिसे नागर शैली में बनाया गया है: विशालता: यह मंदिर तीन मंजिला है, जिसकी कुल लंबाई 380 फीट, चौड़ाई 250 फीट और ऊंचाई लगभग 161 फीट है। खंभे और मंडप: पूरे मंदिर परिसर में कुल 392 खंभे और 5 मंडप (नृत्य मंडप, रंग मंडप, सभा मंडप, प्रार्थना मंडप और कीर्तन मंडप) बनाए गए हैं। पारिस्थितिक और टिकाऊ निर्माण: इस मंदिर के निर्माण में लोहे या स्टील का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं किया गया है ताकि इसकी उम्र हजारों साल तक सुरक्षित रहे। पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए पारंपरिक पत्थरों की interlocking तकनीक का उपयोग किया गया है। 3. मंदिर परिसर और मुख्य आकर्षण रामलला की मूर्ति: गर्भगृह में भगवान श्री राम के 5 वर्ष की आयु के बाल स्वरूप (रामलला) की अचल मूर्ति स्थापित है, जिसे प्रसिद्ध मूर्तिकार अरुण योगीराज द्वारा कृष्ण शिला (काले पत्थर) से तराशा गया है। परकोटा और अन्य मंदिर: मुख्य मंदिर के चारों ओर एक आयताकार परकोटा (चारदीवारी) है, जिसके कोनों पर सूर्यदेव, माता भगवती, गणपति और भगवान शिव के मंदिर बनाए गए हैं। इसके अलावा महर्षि वाल्मीकि, वशिष्ठ, विश्वामित्र और माता शबरी को समर्पित मंदिर भी परिसर में मौजूद हैं। कुबेर टीला: मंदिर परिसर के पास ही प्राचीन कुबेर टीला है, जहाँ जटायु की एक विशाल कांस्य प्रतिमा भी स्थापित की गई है। 4. धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अयोध्या का यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण और एकता का प्रतीक बन चुका है। रामनवमी के पावन अवसर पर यहाँ का उत्सव देखने लायक होता है, जब सूर्य की किरणें विशेष रूप से रामलला के मस्तक पर सूर्य तिलक के रूप में पड़ती हैं। देश-विदेश से रोजाना लाखों श्रद्धालु यहाँ बाबा रामलला के दर्शन के लिए पहुँचते हैं।

माँ तुतला भवानी मंदिर
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माँ तुतला भवानी मंदिर

माँ तुतला भवानी मंदिर (Tutla Bhawani Temple), जिसे तुतराही धाम के नाम से भी जाना जाता है, बिहार के रोहतास जिले के तिलौथू प्रखंड में कैमूर पहाड़ियों की गोद में स्थित एक बेहद प्रसिद्ध धार्मिक और प्राकृतिक पर्यटन स्थल है। यह स्थान माता रानी की आस्था के साथ-साथ अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता और झरने के लिए पूरे बिहार में विख्यात है। ​इस मंदिर के बारे में मुख्य और महत्वपूर्ण जानकारियां निम्नलिखित हैं: ​1. भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक सौंदर्य ​स्थान: यह मंदिर रोहतास जिले के तिलौथू से लगभग 8 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में कैमूर पहाड़ी की एक गहरी और हरी-भरी घाटी में स्थित है। ​तुतला जलप्रपात (Waterfal): मंदिर के ठीक पीछे और ऊपर कैमूर पहाड़ी की चोटी से लगभग 200 फीट की ऊंचाई से एक भव्य झरना गिरता है। यहाँ का पानी नीचे एक खूबसूरत कुंड में गिरता है, जिसे स्थानीय रूप से 'कछुअर नदी' या 'तुतराही नदी' कहा जाता है। बरसात के दिनों में यहाँ की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। ​2. इतिहास और शिलालेख ​प्राचीनता: इस मंदिर का इतिहास 12वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ है। यहाँ चट्टानों पर प्राचीन शिलालेख मौजूद हैं। ​राजा प्रतापध्वल देव: इतिहासकारों के अनुसार, यहाँ चट्टान पर उत्कीर्ण शिलालेख के मुताबिक 1 अप्रैल 1158 ईस्वी (विक्रमी संवत 1214) को खरवार वंश के राजा वीर प्रतापध्वल देव और उनके परिवार द्वारा यहाँ माँ जगद्धात्री महिषमर्दिनी (दुर्गा) की प्रतिमा की स्थापना कराई गई थी। ​3. मुख्य आकर्षण और आस्था ​माता की प्रतिमा: मंदिर के मुख्य चबूतरे पर माँ दुर्गा के स्वरूप (महिषमर्दिनी) की प्रतिमा स्थापित है, जिनकी पूजा करने दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। ​झूला पुल (Hanging Bridge): मुख्य मार्ग से पर्यटकों और श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुँचाने के लिए घाटी के ऊपर एक आकर्षक 'झूला पुल' का निर्माण किया गया है, जिस पर चलना पर्यटकों के लिए एक बहुत ही रोमांचक अनुभव होता है। ​इको टूरिज्म स्पॉट: बिहार सरकार और वन विभाग द्वारा इस क्षेत्र को एक बेहतरीन 'इको-पर्यटन स्थल' के रूप में विकसित किया गया है, जहाँ हर साल 'तुतला भवानी महोत्सव' का भी आयोजन किया जाता है। ​4. मेला और विशेष अवसर ​यहाँ साल भर पर्यटकों और भक्तों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन शारदीय नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, सावन और आर्द्रा नक्षत्र के दौरान यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। धार्मिक आस्था और पहाड़ों-## माँ तुतला भवानी मंदिर (Tutla Bhawani Temple) ​माँ तुतला भवानी मंदिर (जिसे तुतलाधाम के नाम से भी जाना जाता है) भारत के बिहार राज्य के रोहतास जिले में स्थित एक बेहद प्रसिद्ध, प्राचीन और प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर धार्मिक स्थल है। यह पावन स्थल कैमूर की पहाड़ियों की गोद में, सासाराम और डेहरी-ऑन-सोन के पास स्थित है। ​मुख्य विशेषताएँ और इतिहास ​पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व: यह मंदिर प्राकृतिक चट्टानों और एक भव्य झरने के बीच स्थित है। यहाँ की चट्टानों पर प्राचीन ब्राह्मी लिपि में लिखे गए शिलालेख और मूर्तियाँ मौजूद हैं, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती हैं। इतिहासकारों के अनुसार, यह स्थान प्राचीन काल से ही शक्ति की आराधना का एक प्रमुख केंद्र रहा है। ​प्राकृतिक सौंदर्य: तुतला भवानी धाम अपने मनमोहक झरने (वॉटरफॉल) और घने जंगलों के लिए पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है। बरसात के मौसम में यहाँ का दृश्य और भी अधिक मनोरम हो जाता है, जब ऊँची पहाड़ियों से गिरता हुआ पानी इस स्थान को बेहद खूबसूरत बना देता है। ​मुख्य पर्व: यहाँ नवरात्रि (चैत्र और शारदीय दोनों) के दौरान बहुत बड़ा मेला लगता है। इस अवसर पर दूर-दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए पहुँचते हैं। ​भौगोलिक स्थिति और यात्रा की जानकारी ​स्थान: यह स्थल रोहतास जिले के तिलौथू प्रखंड के अंतर्गत कैमूर पहाड़ी की श्रृंखलाओं में स्थित है। ​निकटतम रेलवे स्टेशन: डेहरी-ऑन-सोन (Dihn-on-Sone) और सासाराम (Sasaram) यहाँ के सबसे नजदीकी प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं। ​सड़क मार्ग: सासाराम या डेहरी से सड़क मार्ग द्वारा वाहन (ऑटो, टैक्सी या निजी वाहन) के माध्यम से आसानी से यहाँ पहुँचा जा सकता है। सड़क मार्ग पहाड़ियों के पास तक जाता है, जिसके बाद सीढ़ियों और पैदल मार्ग से मुख्य मंदिर तक पहुँचना होता है।

विंध्याचल मंदिर
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विंध्याचल मंदिर

विंध्याचल मंदिर (Vindhyachal Temple), जिसे माँ विंध्यवासिनी देवी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, भारत के सबसे प्रमुख, पवित्र और प्राचीन शक्तिपीठों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में, पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर सनातन धर्म में त्रिकोणीय देवी दर्शन का मुख्य केंद्र है और इसके बारे में मुख्य जानकारियां निम्नलिखित हैं: 1. धार्मिक महत्व और कथा शक्तिपीठ: पौराणिक कथाओं के अनुसार, जहाँ-जहाँ देवी सती के अंग गिरे थे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई। विंध्याचल वह स्थान है जहाँ माता सती के चरण गिरे थे। अखंड ज्योति: माता विंध्यवासिनी को सृष्टिकर्ता की आदिशक्ति माना जाता है। यहाँ माँ का स्वरूप अत्यंत सौम्य और कल्याणकारी है। मंदिर के गर्भ गृह में माँ की भव्य मूर्ति स्थापित है, जिनके दर्शन मात्र से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। महाभारत और पुराणों में उल्लेख: विंध्याचल पर्वत श्रृंखला का वर्णन पुराणों और महाभारत में भी मिलता है। ऐसी मान्यता है कि द्वापर युग में भगवान कृष्ण के जन्म के समय योगमाया (जिन्हें कंस ने मारना चाहा था) यहीं विंध्याचल पर्वत पर आकर प्रकट हुईं और आकाशवाणी कर कंस को उसके अंत की चेतावनी दी थी। 2. त्रिकोण दर्शन (Trikon Parikrama) विंध्याचल की यात्रा 'त्रिकोण परिक्रमा' के बिना अधूरी मानी जाती है। इसमें तीन मुख्य देवियों के दर्शन किए जाते हैं: माँ विंध्यवासिनी देवी: (मुख्य मंदिर - गंगा तट के पास) माँ अष्टभुजा देवी: (मुख्य मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर स्थित, जहाँ माता महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का समन्वित रूप माना जाता है) माँ कालीखोह मंदिर: (अष्टभुजा से थोड़ी दूरी पर पहाड़ी की गुफा में स्थित महाकाली का प्राचीन मंदिर) जो श्रद्धालु विंध्याचल आते हैं, वे इन तीनों मंदिरों की त्रिकोण परिक्रमा अवश्य करते हैं। 3. प्रमुख आकर्षण और मेले नवरात्रि का पर्व: चैत्र नवरात्रि (वसन्त) और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहाँ देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। नवरात्रि के इन नौ दिनों में यहाँ का भव्य मेला और माता का श्रृंगार देखने योग्य होता है। गंगा स्नान: मंदिर के ठीक पास ही गंगा नदी का पक्का घाट (विंध्य कॉरिडोर/गंगा घाट) है, जहाँ श्रद्धालु स्नान करने के बाद माँ के दर्शन के लिए कतारबद्ध होते हैं। अखंड पाठ और अनुष्ठान: यहाँ दूर-दूर से लोग मुंडन संस्कार, विवाह की शुरुआत, गृह प्रवेश और विशेष मन्नतें पूरी होने पर हवन-पूजन और कन्या पूजन कराने आते हैं।

रजरप्पा मंदिर
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रजरप्पा मंदिर

रजरप्पा मंदिर (Rajrappa Temple), जिसे आधिकारिक तौर पर माँ छिन्नमस्तिका मंदिर कहा जाता है, झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित एक अत्यंत प्रसिद्ध, प्राचीन और रहस्यमयी हिंदू तीर्थ स्थल है। यह भारत के प्रमुख शक्तिपीठों और तांत्रिक साधना के बड़े केंद्रों में गिना जाता है। ​इस मंदिर के बारे में मुख्य और महत्वपूर्ण जानकारियां नीचे दी गई हैं: ​1. भौगोलिक स्थिति और बनावट ​स्थान: यह मंदिर झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 80 किलोमीटर दूर और रामगढ़ जिला मुख्यालय से करीब 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ​नदियों का संगम: यह मंदिर दामोदर और भैरवी (जिसे भेड़ा नदी भी कहते हैं) नदियों के संगम तट पर स्थित है। यहाँ प्राकृतिक सौंदर्य और झरना (रजरप्पा जलप्रपात) पर्यटकों और श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र है। ​2. माँ छिन्नमस्तिका का रहस्यमयी स्वरूप ​रजरप्पा मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ स्थापित माता की प्रतिमा है, जो दुनिया भर में अद्वितीय है: ​कटा हुआ सिर: माँ छिन्नमस्तिका के इस स्वरूप में उनका सिर धड़ से अलग (कटा हुआ) है और उनके गले से रक्त की तीन धाराएं निकल रही हैं। ​प्रतिमा की बनावट: माता का कटा हुआ सिर उनके अपने ही एक हाथ में है और दूसरे हाथ में तलवार है। उनका यह रूप आत्म-बलिदान और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है। ​पौराणिक कथा: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार माता पार्वती अपनी सखियों (डाकिनी और वर्णिनी) के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान के बाद भूख से व्याकुल सखियों का शरीर भूख के मारे काला पड़ने लगा और उन्होंने माता से भोजन की मांग की। तब माता ने अपनी ही तलवार से अपना सिर काट दिया। उनके कटे सिर से निकली रक्त की धाराओं से सखियों की भूख शांत हुई। ​3. तांत्रिक महत्व और मान्यता ​असम के प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर के बाद रजरप्पा के छिन्नमस्तिका मंदिर को तंत्र साधना का दूसरा सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सिद्धपीठ माना जाता है। ​यहाँ देश के कोने-कोने से तांत्रिक, अघोरी और साधक विशेष सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आते हैं। विशेषकर अमावस्या, महाशिवरात्रि, नवरात्रि और गुप्त नवरात्रि के दौरान यहाँ का माहौल पूरी तरह से आध्यात्मिक और तांत्रिक अनुष्ठानों से जुड़ा होता है। ​4. मंदिर का इतिहास और महत्व ​प्राचीनता: इस मंदिर के इतिहास को लेकर इतिहासकारों और जानकारों का मानना है कि यह लगभग 6,000 साल पुराना है और इसका उल्लेख विभिन्न पुराणों में भी मिलता है। ​मुंडमाला और स्वरूप: माता की यह मूर्ति कमल के फूल पर विराजमान है और उनके पैरों के नीचे कामदेव और रति शयन मुद्रा में लेटे हुए हैं। ​यदि आप धार्मिक आस्था, प्राकृतिक सुंदरता और तंत्र साधना के रहस्यों को करीब से देखना चाहते हैं, तो रजरप्पा का यह पावन स्थल एक बेहद खास जगह है।

KASHI VISHWANATH TEMPLE
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KASHI VISHWANATH TEMPLE

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश के प्राचीन शहर वाराणसी (काशी/बनारस) में स्थित, भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत प्रसिद्ध और पवित्र हिंदू मंदिर है। यह हिंदुओं के सबसे प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है और भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में विशेष स्थान रखता है। ​इस मंदिर के बारे में मुख्य और महत्वपूर्ण जानकारियां निम्नलिखित हैं: ​1. धार्मिक महत्व और मान्यता ​विश्व के स्वामी: मंदिर के मुख्य देवता को 'श्री विश्वनाथ' या 'विश्वेश्वर' कहा जाता है, जिसका अर्थ है "ब्रह्मांड के स्वामी"। ​मोक्ष नगरी: ऐसी धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति काशी में प्राण त्यागता है या जिसे यहाँ मृत्यु प्राप्त होती है, उसे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति यानी 'मोक्ष' की प्राप्ति होती है। ​अविमुक्त क्षेत्र: हिन्दू शास्त्रों (जैसे स्कंद पुराण और अग्नि पुराण) के अनुसार, यह क्षेत्र भगवान शिव और माता पार्वती का आदि स्थान है। प्रलयकाल में भी इस स्थान का नाश नहीं होता, क्योंकि शिव इसे अपने त्रिशूल पर धारण करते हैं। ​2. इतिहास और पुनर्निर्माण ​काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास उतार-चढ़ाव और संघर्षों से भरा रहा है: ​प्राचीनता: इस मंदिर का उल्लेख वेदों, पुराणों तथा प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। ​विदेशी आक्रमण: कालान्तर में कई विदेशी आक्रमणकारियों और मुस्लिम शासकों (जैसे मुहम्मद गौरी, जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह और मुगल शासक औरंगजेब) ने इस मंदिर को तुड़वाकर नष्ट करने का प्रयास किया और इसके अवशेषों पर मस्जिद का निर्माण कराया। ​वर्तमान स्वरूप का निर्माण: ​सन 1780 में इंदौर की मराठा महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था। ​इसके बाद सन 1835 में पंजाब के सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह ने इस मंदिर के शिखरों और गुंबदों को करीब 1000 किलोग्राम शुद्ध सोने से मढ़वाया था, जिसके कारण इसे 'गोल्डन टेम्पल' (स्वर्ण मंदिर) के रूप में भी जाना जाता है। ​3. श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर (आधुनिक स्वरूप) ​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस ऐतिहासिक स्थल का पुनरुद्धार करते हुए 'श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर' (Vishwanath Dham) का निर्माण किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य मंदिर के आसपास के संकरे परिसरों को खोलना और सीधे गंगा नदी से जोड़ना है, जिससे देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को सुगमता से बाबा विश्वनाथ के दर्शन और गंगा स्नान का लाभ मिल सके। ​4. दर्शन और मुख्य आकर्षण ​गंगा आरती: मंदिर के समीप गंगा नदी के घाटों पर होने वाली भव्य संध्या आरती विश्व प्रसिद्ध है, जिसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। ​विशेष समय: यहाँ यूं तो पूरे साल भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन सावन के महीने, महाशिवरात्रि और देव दीपावली पर इस मंदिर की छटा और दिव्यता देखने लायक होती है।

MUNDESHWARI TEMPLE
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MUNDESHWARI TEMPLE

माँ मुंडेश्वरी मंदिर बिहार राज्य के कैमूर जिले में पंवरा पहाड़ी की चोटी पर स्थित एक अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक हिन्दू मंदिर है, जिसे भारत का सबसे पुराना "जीवित" मंदिर माना जाता है। ????मंदिर का इतिहास और विशेषताएँ यह मंदिर लगभग 608 फीट ऊँचाई वाली पहाड़ी पर स्थित है और इसके निर्माण का समय लगभग 108 ईस्वी या उससे पहले का माना जाता है, जिसे 4वीं-5वीं शताब्दी गुप्तकालिन अवधि से भी जोड़ा जाता है। ????यह मंदिर अष्टकोणीय (आठ कोनों वाला) पत्थर से बना है, जो इसे स्थापत्य की दृष्टि से अनूठा बनाता है। ⚡मंदिर में देवी मुण्डेश्वरी भवानी की आठ भुजाओं वाली प्रतिमा मुख्य आकर्षण है, जिनका वाहन महिष है और वे वाराही रूप में प्रतिष्ठित हैं। ????????गर्भगृह में पंचमुखी शिवलिंग भी स्थापित है, जिससे यह स्थल शैव और शक्त—दोनों संप्रदायों का संगम है। ????मंदिर में चार द्वार हैं, जिनमें से एक बंद है और एक अर्ध्द्वार के रूप में रह गया है। ????धार्मिक मान्यता और कथाएं पुराणों के अनुसार माता ने चंड-मुंड नामक राक्षसों का वध किया था, जिसमें मुंड के वध के कारण देवी को “मुण्डेश्वरी” कहा जाने लगा। ????भक्तों की मान्यता है कि यहां मां के दरबार में मांगी गई मन्नतें अवश्य पूरी होती हैं। अनूठी परंपराएं यहाँ बकरे की बलि देने की रस्म प्रचलित है, लेकिन विशेष बात यह है कि बकरे के रक्त की बलि नहीं चढ़ाई जाती। बलि के समय बकरे को माता के सामने लाया जाता है, पुजारी अक्षत फेंकते हैं और बकरा कुछ समय के लिए अचेत हो जाता है, लेकिन थोड़ी देर बाद फिर उठ खड़ा होता है। ⛳यह विधि पूरे भारत में अद्वितीय मानी जाती है जहाँ हिंसारहित बलि की परंपरा है। ????यात्रा संबंधी जानकारियाँ मंदिर तक पहुँचने के लिए सड़क मार्ग उपलब्ध है और भभुआ रोड (मोहनियाँ) स्टेशन नजदीकी रेलवे स्टेशन है। ????नवरात्र, वसंत पंचमी और महाशिवरात्रि जैसे त्योहारों पर यहाँ हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। वास्तुशिल्प एवं सांस्कृतिक महत्व मंदिर में श्री यंत्र आधारित नक्काशी है और इसके शिलालेख उत्तर गुप्त काल के माने जाते हैं। इसमें गणेश, सूर्य और विष्णु की भी मूर्तियाँ हैं। माँ मुंडेश्वरी मंदिर न केवल भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है, बल्कि अपनी अद्भुत परंपराओं, वास्तुशिल्प और शक्तिपीठ के रूप में धार्मिक आस्था का केंद्र भी है।

BIHAR JHARKHAND NEPAL TOUR PACKAGE
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BIHAR JHARKHAND NEPAL TOUR PACKAGE

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VANARSHI
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VANARSHI

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